दिल हमारा सुलगता जा रहा है,
पर बेचारा धड़कता जा रहा है।
क्या आज उसने सच बोला है,
क्यों ऐसे हदबदाता जा रहा है।
परछाई मेरी मुझ से भाग रही है,
एक तू है जो लिपटता जा रहा है।
वोह कहने लगे लड़के में कुछ तो है,
गिरते गिरते संभालता जा रहा है।
उम्र बढ़ी तो अकड़ कम हो गई,
अब जा के तू समजता जा रहा है.
Thursday, January 28, 2010
Wednesday, January 27, 2010
में
आज-कल फिर से लिखा करता हु,
में अब फिर से में दिखा करता हु ।
दिल नरम नरम आँखे भीगी भीगी सी,
क्यों न हो उन से मिला करता हु।
जाए उनके दर पे और कोई न पूछे,
में खुद को रोक लिया करता हु।
जो मेरे बस की न हो वोह बात,
में खुदा को सॉप दिया करता हु।
ख़ुशी में भिजवाता हु अक्सर लड्डू,
गम मे मे रोटी बाँट लिया करता हु.
में अब फिर से में दिखा करता हु ।
दिल नरम नरम आँखे भीगी भीगी सी,
क्यों न हो उन से मिला करता हु।
जाए उनके दर पे और कोई न पूछे,
में खुद को रोक लिया करता हु।
जो मेरे बस की न हो वोह बात,
में खुदा को सॉप दिया करता हु।
ख़ुशी में भिजवाता हु अक्सर लड्डू,
गम मे मे रोटी बाँट लिया करता हु.
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